September 25, 2026 | 04:21:15
पटना: टी.पी.एस. कॉलेज, पटना के हिन्दी विभाग एवं IQAC के संयुक्त तत्वावधान में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की जयंती के अवसर पर ‘दिनकर साहित्य में राष्ट्र, समाज और मानवीय संवेदना’ विषय पर गरिमामय साहित्यिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्रधानाचार्य प्रो. (डॉ.) तपन कुमार शांडिल्य ने की, जबकि मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. (डॉ.) सुनीता गुप्ता ने दिनकर के साहित्य के विविध पक्षों पर विचार व्यक्त किए।
अध्यक्षीय उद्बोधन की शुरुआत प्रो. (डॉ.) तपन कुमार शांडिल्य ने दिनकर की प्रसिद्ध पंक्तियों—“मरणोपरांत यदि जीने की है चाह तुझे, तो सुन, बतलाता हूँ मैं सीधी राह तुझे। लिख ऐसी कोई चीज कि दुनिया डोल उठे, या कर कुछ ऐसा काम जमाना बोल उठे।”—के पाठ से की। उन्होंने कहा कि दिनकर की कविताएँ मनुष्य को भाग्य के भरोसे बैठने के बजाय संघर्ष और पुरुषार्थ के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं। उनकी रचनाएँ विपरीत परिस्थितियों में भी निराश न होकर कर्म और साहस के मार्ग पर चलने का संदेश देती हैं।
प्रो. शांडिल्य ने दिनकर की प्रसिद्ध पंक्ति “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” का उल्लेख करते हुए कहा कि यह पंक्ति केवल सत्ता को चुनौती देने वाली हुंकार नहीं, बल्कि जनशक्ति, जागरूकता और लोकतांत्रिक चेतना का सशक्त उद्घोष है। दिनकर ने साहित्य के माध्यम से आम जनता की शक्ति और उसके अधिकारों को स्वर दिया। उनकी रचनाओं में शोषण, अन्याय और सामाजिक असमानता के विरुद्ध आवाज उठाने तथा जनमानस में आत्मसम्मान और जागरूकता पैदा करने की प्रेरणा मिलती है।
उन्होंने कहा कि दिनकर के साहित्य में व्यक्ति की पहचान उसकी जाति या जन्म से नहीं, बल्कि उसके ज्ञान, कर्म और प्रतिभा से निर्धारित होती है। इस दृष्टि से दिनकर का साहित्य सामाजिक समानता और मानवीय गरिमा का भी सशक्त संदेश देता है। उन्होंने विद्यार्थियों को दिनकर का साहित्य गंभीरता से पढ़ने के लिए प्रेरित करते हुए कहा कि उनकी रचनाओं का अध्ययन जीवन को नई दृष्टि और नई दिशा प्रदान कर सकता है। उनकी कृति ‘हुंकार’ में देश और राष्ट्र के निर्माण के लिए जागरण, संघर्ष और सक्रियता का आह्वान मिलता है। दिनकर का साहित्य युवाओं में आत्मविश्वास जगाता है और उन्हें राष्ट्र-निर्माण में सकारात्मक भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करता है।
मुख्य वक्ता प्रो. (डॉ.) सुनीता गुप्ता ने कहा कि दिनकर की रचनाएँ राष्ट्रीय चेतना की प्रखर वाहक हैं। उनकी कविता का स्वाभाविक आवेग व्यक्ति को जड़ता और निष्क्रियता से बाहर निकालकर संघर्ष, कर्म और जागरण की ओर ले जाता है। उन्होंने दिनकर के साहित्य में राष्ट्रीय एकता, सामाजिक चेतना और मानवीय मूल्यों के महत्व को रेखांकित किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ राष्ट्रकवि दिनकर के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। स्वागत भाषण एवं विषय प्रवर्तन हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. शशि भूषण चौधरी ने किया। उन्होंने दिनकर के साहित्य में राष्ट्रबोध, सामाजिक सरोकार और मानवीय संवेदना के विविध पक्षों पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम के दौरान महाविद्यालय के लेखाकार कुमार अमिताभ ने दिनकर की प्रसिद्ध कृति ‘रश्मिरथी’ के तृतीय सर्ग का भावपूर्ण एवं ओजस्वी पाठ प्रस्तुत किया। उनके पाठ को उपस्थित श्रोताओं ने खूब सराहा और यह कार्यक्रम का विशेष आकर्षण रहा।
मंच संचालन डॉ. ओंकार पासवान ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अश्विनी कुमार ने किया।
इस अवसर पर IQAC समन्वयक प्रो. रूपम, प्रो. अंजली प्रसाद, प्रो. नवेंदु शेखर, प्रो. ज्योत्सना कुमारी, प्रो. ऊषा किरण, डॉ. विजय कुमार सिन्हा, डॉ. प्रशांत कुमार, डॉ. विनय भूषण कुमार, डॉ. मुकुंद कुमार, डॉ. सुशोभन पलाधि, डॉ. नूपुर, डॉ. शशि शेखर कुमार सिंह, डॉ. चंद्रशेखर कुमार ठाकुर, डॉ. हंस कुमार सिंह, डॉ. सुनीता कुमारी, डॉ. उमेश कुमार, डॉ. सोनू प्रताप चौधरी, डॉ. रवि प्रभाकर, डॉ. चांदनी कुमारी, डॉ. पूजा कुमारी, कुमार अमिताभ, श्री दीपक कुमार, श्री मृत्युंजय कुमार, सिद्धेश्वरी पाण्डेय सहित महाविद्यालय के शिक्षकगण, शिक्षकेतर कर्मचारी, शोधार्थी एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे।