November 06, 2026 | 23:47:12
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत और गिरफ्तारी को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की समयसीमा पुलिस द्वारा औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज करने के समय से नहीं, बल्कि वास्तविक हिरासत में लेने के समय से शुरू होगी। जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने कहा कि गिरफ्तारी और हिरासत के बीच कृत्रिम अंतर करके किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों को कमजोर नहीं किया जा सकता।
अदालत के मुताबिक, पुलिस किसी व्यक्ति को हिरासत में लेकर बाद में औपचारिक गिरफ्तारी दिखाकर 24 घंटे की समयसीमा को आगे नहीं बढ़ा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट की अदालत तक पहुंचने में लगने वाला आवश्यक यात्रा समय ही 24 घंटे की गणना से बाहर रखा जा सकता है।
कोर्ट ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक समय तक मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए बिना हिरासत में रखा जाता है, तो उसे तत्काल रिहा किया जाना चाहिए।
अदालत ने मजिस्ट्रेटों को भी निर्देश दिया कि वे हिरासत में लेने की वास्तविक तारीख और समय दर्ज करें तथा यह जांचें कि संवैधानिक नियमों का पालन हुआ है या नहीं।
इस फैसले को नागरिकों के व्यक्तिगत अधिकारों और पुलिस हिरासत में सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।